…इंसान जाने कहा खो गए ….By Krishika Sankhant

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…इंसान जाने कहा खो गए ….
जाने क्यों अब शर्म से चेहरे गुलाब नहीं होते,
जाने क्यों अब मस्त मौला मिज़ाज़ नहीं होते…
पहले बता दिया करते थे दिल की बाते,
 जाने क्यों अब चेहरे खुली किताब नहीं होते…
सुना है बिना कहे दिल की बात समज लेते थे,
गले लगते ही दोस्त हालत समज लेते थे….
तब न F.B था न smart phone और नाही Twitter Account, 
एक चिट्ठी से ही दिलो के जज्बात समज लेते थे…. सोचती हु हम कहा से कहा आ गए , 
व्यवहारिकता सोचते सोचते भावनाओ को खा गए…
अब भाई -भाई से समस्या का समाधान कहा पूछता है… 
अब बेटा बाप से उलझनों का सुझाव कहा पूछता है…
बेटी नहीं पूछती माँ से गृहस्ती के सलीके… अब कोन गुरु के चरणों में बैठकर ज्ञान की परिभाषा सिखता है…
परियो की बाते  अब किसे भाती है…
अपनों की याद अब किसे रुलाती ह…
अब कोन गरीबो को सखा बताता है…
 अब कहा कृष्ण सुदामा को गले लगता है… 
ज़िन्दगी में हम केवल व्यावहारिक हो है…
हम सब मशीन बन गए है …
इंसान ना जाने कहा खो गए है….          
                          _krishika sankhat…

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